द्वितीयः पाठः : जयदेवस्य औदार्यम् (जयदेव की उदारता)
गद्यांश 1
संस्कृत:
गीतगोविन्दस्य रचयिता जयदेवः सुप्रसिद्धः महाकविः आसीत्। सः कदाचित् तीर्थयात्रां कुर्वन् आसीत्। जयदेवस्य कीर्तिः देशे सर्वत्र प्रसूता आसीत्। अतः मार्गे तत्र तत्र जनाः तस्य सम्माननं कुर्वन्ति स्म। तस्मै धनमपि अर्पयन्ति स्म।
केचन लुण्ठकाः एतत् ज्ञातवन्तः। जयदेवस्य धनम् अपहर्तुं ते एकम् उपायं चिन्तितवन्तः। तेऽपि यात्रिकाः इव वेषपरिवर्तनं कृत्वा जयदेवेन सह तीर्थयात्रायां मिलिताः। मध्येमार्गं यदा ते अरण्यं प्रविष्टवन्तः, तदा लुण्ठकाः जयदेवस्य पाणिपादं कर्जयित्वा तम् एकस्मिन् कूपे क्षिप्तवन्तः। तदीयं धनं सर्वम् अपहृत्य ततः पलायनं कृतवन्तः।
केचन लुण्ठकाः एतत् ज्ञातवन्तः। जयदेवस्य धनम् अपहर्तुं ते एकम् उपायं चिन्तितवन्तः। तेऽपि यात्रिकाः इव वेषपरिवर्तनं कृत्वा जयदेवेन सह तीर्थयात्रायां मिलिताः। मध्येमार्गं यदा ते अरण्यं प्रविष्टवन्तः, तदा लुण्ठकाः जयदेवस्य पाणिपादं कर्जयित्वा तम् एकस्मिन् कूपे क्षिप्तवन्तः। तदीयं धनं सर्वम् अपहृत्य ततः पलायनं कृतवन्तः।
हिंदी अर्थ:
'गीतगोविन्द' के रचयिता जयदेव सुप्रसिद्ध महाकवि थे। वे कभी तीर्थयात्रा कर रहे थे। जयदेव की कीर्ति देश में सर्वत्र फैली हुई थी। इसलिए रास्ते में जगह-जगह लोग उनका सम्मान करते थे और उन्हें धन भी अर्पित करते थे।
कुछ लुटेरों (ठगों) को यह बात पता चल गई। जयदेव का धन चुराने के लिए उन्होंने एक उपाय सोचा। वे भी यात्रियों की तरह वेश बदलकर जयदेव के साथ तीर्थयात्रा में मिल गए। रास्ते में जब वे जंगल में घुसे, तब लुटेरों ने जयदेव के हाथ-पैर काटकर उन्हें एक कुएं में फेंक दिया और उनका सारा धन लूटकर वहाँ से भाग गए।
कुछ लुटेरों (ठगों) को यह बात पता चल गई। जयदेव का धन चुराने के लिए उन्होंने एक उपाय सोचा। वे भी यात्रियों की तरह वेश बदलकर जयदेव के साथ तीर्थयात्रा में मिल गए। रास्ते में जब वे जंगल में घुसे, तब लुटेरों ने जयदेव के हाथ-पैर काटकर उन्हें एक कुएं में फेंक दिया और उनका सारा धन लूटकर वहाँ से भाग गए।
गद्यांश 2
संस्कृत:
दैवात् तस्मिन् कूपे जलं न आसीत्। कूपे पतितः जयदेवः किञ्चित्कालानंतरं चेतनां प्राप्तवान्। ततश्च तत्र एव उपविश्य उच्चैः भगवतः नामस्मरणं कर्तुम् आरब्धवान्।
तदिने गौडेश्वरः लक्ष्मणसेनः तेन एव मार्गेण गच्छन् आसीत्। सः कूपतः मनुष्यस्य ध्वनिं श्रुत्वा सेवकैः तत्र पतितं जयदेवम् उपरि आनीतवान्। तं स्वने सह राजधानीं नीतवान् च। बहुवारं पृष्टः अपि जयदेवः स्वस्य पाणिपादं कर्तितवतां लुण्ठकानां विषये किमपि न उक्तवान्। जयदेवस्य भगवद्भक्तिं साधुस्वभावं च दृष्ट्वा महाराजः एवं प्रभावितः अभवत् यत् सः तं स्वस्य आस्थानपण्डितम् अकरोत्।
तदिने गौडेश्वरः लक्ष्मणसेनः तेन एव मार्गेण गच्छन् आसीत्। सः कूपतः मनुष्यस्य ध्वनिं श्रुत्वा सेवकैः तत्र पतितं जयदेवम् उपरि आनीतवान्। तं स्वने सह राजधानीं नीतवान् च। बहुवारं पृष्टः अपि जयदेवः स्वस्य पाणिपादं कर्तितवतां लुण्ठकानां विषये किमपि न उक्तवान्। जयदेवस्य भगवद्भक्तिं साधुस्वभावं च दृष्ट्वा महाराजः एवं प्रभावितः अभवत् यत् सः तं स्वस्य आस्थानपण्डितम् अकरोत्।
हिंदी अर्थ:
दैवयोग से उस कुएं में जल नहीं था। कुएं में गिरे हुए जयदेव ने कुछ समय बाद चेतना प्राप्त की और वहीं बैठकर जोर-जोर से भगवान का नाम स्मरण करने लगे।
उसी दिन गौडेश्वर लक्ष्मणसेन उसी रास्ते से जा रहे थे। उन्होंने कुएं से किसी मनुष्य की आवाज सुनकर सेवकों द्वारा गिरे हुए जयदेव को बाहर निकलवाया और उन्हें अपने साथ राजधानी ले गए। बहुत बार पूछने पर भी जयदेव ने अपने हाथ-पैर काटने वाले लुटेरों के विषय में कुछ नहीं बताया। जयदेव की भगवद्भक्ति और अच्छे स्वभाव को देखकर महाराज इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपना दरबारी पंडित (आस्थानपण्डित) बना लिया।
उसी दिन गौडेश्वर लक्ष्मणसेन उसी रास्ते से जा रहे थे। उन्होंने कुएं से किसी मनुष्य की आवाज सुनकर सेवकों द्वारा गिरे हुए जयदेव को बाहर निकलवाया और उन्हें अपने साथ राजधानी ले गए। बहुत बार पूछने पर भी जयदेव ने अपने हाथ-पैर काटने वाले लुटेरों के विषय में कुछ नहीं बताया। जयदेव की भगवद्भक्ति और अच्छे स्वभाव को देखकर महाराज इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपना दरबारी पंडित (आस्थानपण्डित) बना लिया।
गद्यांश 3
संस्कृत:
राजभवने कदाचित् कश्चन उत्सवः आयोजितः आसीत्। तदा बहवः साधवः, ब्राह्मणाः, भिक्षुकाश्च भोजनार्थं तत्र सम्मिलिताः। जयदेवस्य पाणिपादं ये कर्तितवन्तः तेऽपि लुण्ठकाः भिक्षुकवेषेण तत्र आगताः आसन्। ते भिन्नगात्रं जयदेवम् दृष्ट्वा अभिज्ञातवन्तः। परं पण्डितस्थाने तं दृष्ट्वा तेषां प्राणाः गताः इव। जयदेवः अपि तान् अभिज्ञातवान्। सः महाराजम् उक्तवान्— “एते सन्ति मम पूर्वतनसुहृदः। भवान् यदि इच्छति तर्हि एतेभ्यः किमपि दातुम् अर्हति” इति।
महाराजः तान् समीपम् आहूतवान्। भूरिधनदानेन तान् सत्कृतवान् च। ततः ‘एतान् सुरक्षीतूपेन गृहं प्राप्य आगच्छन्तु’ इति सेवकान् आदिष्टवान्।
महाराजः तान् समीपम् आहूतवान्। भूरिधनदानेन तान् सत्कृतवान् च। ततः ‘एतान् सुरक्षीतूपेन गृहं प्राप्य आगच्छन्तु’ इति सेवकान् आदिष्टवान्।
हिंदी अर्थ:
राजभवन में कभी कोई उत्सव आयोजित हुआ था। तब बहुत से साधु, ब्राह्मण और भिक्षुक भोजन के लिए वहाँ एकत्रित हुए। जयदेव के हाथ-पैर काटने वाले वे लुटेरे भी भिक्षुक के वेश में वहाँ आए थे। उन्होंने कटे हुए अंगों वाले जयदेव को देखकर पहचान लिया। परंतु पंडित के स्थान पर उन्हें देखकर उनके प्राण जैसे उड़ गए। जयदेव ने भी उन्हें पहचान लिया। उन्होंने महाराज से कहा— "ये मेरे पुराने मित्र हैं। यदि आप चाहें तो इन्हें कुछ भी दान दे सकते हैं।"
महाराज ने उन्हें पास बुलाया और बहुत सारा धन देकर उनका सत्कार किया। इसके बाद सेवकों को आदेश दिया कि 'इन्हें सुरक्षित रूप से इनके घर पहुँचा कर आइए'।
महाराज ने उन्हें पास बुलाया और बहुत सारा धन देकर उनका सत्कार किया। इसके बाद सेवकों को आदेश दिया कि 'इन्हें सुरक्षित रूप से इनके घर पहुँचा कर आइए'।
गद्यांश 4
संस्कृत:
मार्गे गमनसमये सेवकाः कुतुहलेन तान् पृष्टवन्तः— “भोः, भवताम्, अस्माकम् आस्थानपण्डितस्य च कः सम्बन्धः?” इति।
दुरात्मनः ते लुण्ठकाः उक्तवन्तः— “पूर्व कस्मिंश्चित् राज्ये भवतां पण्डितः अस्माकम् सह राजकर्मचारी आसीत्। तदा कदाचित् तेन तादृशः अपराधः आचरितः, यन कुपितः राजा तस्य वधदण्डम् आदिष्टवान्। किन्तु वयं तस्य विषये दयां कृत्वा पाणिपादं केवलं कर्तयित्वा तं सजीवं मोचितवन्तः। एतत् रहस्यं वयं कदाचित् वदेम इति अभीत्या सः एवम् अस्माकम् सम्माननं कारितवान्” इति।
दुरात्मनः ते लुण्ठकाः उक्तवन्तः— “पूर्व कस्मिंश्चित् राज्ये भवतां पण्डितः अस्माकम् सह राजकर्मचारी आसीत्। तदा कदाचित् तेन तादृशः अपराधः आचरितः, यन कुपितः राजा तस्य वधदण्डम् आदिष्टवान्। किन्तु वयं तस्य विषये दयां कृत्वा पाणिपादं केवलं कर्तयित्वा तं सजीवं मोचितवन्तः। एतत् रहस्यं वयं कदाचित् वदेम इति अभीत्या सः एवम् अस्माकम् सम्माननं कारितवान्” इति।
हिंदी अर्थ:
रास्ते में जाते समय सेवकों ने उत्सुकता से उनसे पूछा— "अरे, आप दोनों का और हमारे दरबारी पंडित का क्या संबंध है?"
उन दुष्ट लुटेरों ने कहा— "पहले किसी राज्य में आपके पंडित हमारे साथ राजकर्मचारी थे। तब कभी उन्होंने ऐसा अपराध किया था, जिससे क्रोधित होकर राजा ने उन्हें वध का दंड आदेश दिया था। किंतु हमने उन पर दया करके केवल हाथ-पैर काटकर उन्हें जीवित ही छोड़ दिया था। यह रहस्य हम कभी किसी से कह न दें, इसी डर से उन्होंने हमारा ऐसा सम्मान कराया है।"
उन दुष्ट लुटेरों ने कहा— "पहले किसी राज्य में आपके पंडित हमारे साथ राजकर्मचारी थे। तब कभी उन्होंने ऐसा अपराध किया था, जिससे क्रोधित होकर राजा ने उन्हें वध का दंड आदेश दिया था। किंतु हमने उन पर दया करके केवल हाथ-पैर काटकर उन्हें जीवित ही छोड़ दिया था। यह रहस्य हम कभी किसी से कह न दें, इसी डर से उन्होंने हमारा ऐसा सम्मान कराया है।"
गद्यांश 5
संस्कृत:
तदा लुण्ठकानाम् एतादृशं व्यवहारं सोढुम् अशक्तवती भूमिः स्वयमेव विदीर्णा अभवत्। लुण्ठकाः तत्र पतित्वा मृताः अभवन्। सेवकाः खेदेन ततः प्रतिगम्य जयदेवं महाराजं च वृत्तं निवेदितवन्तः। सर्वं श्रुत्वा जयदेवः— “हन्त! मया चिन्तितं यत् एते निर्धनाः सन्ति। धनलोभेन पापं कुर्वन्ति। धनं यदि लभ्यते तर्हि अग्रे पापं न कुर्युः, इति। परन्तु निर्भाग्यस्य मम कारणतः तैः प्राणाः त्यक्तव्याः अभवन्। हे भगवन्! तेभ्यः सद्गतिं ददातु” इति।
तक्षणादेव जयदेवस्य कर्तितं पाणिपादं पुनः यथापूर्वम् उत्पन्नम् अभवत्। अहो औदार्यं जयदेवस्य।
तक्षणादेव जयदेवस्य कर्तितं पाणिपादं पुनः यथापूर्वम् उत्पन्नम् अभवत्। अहो औदार्यं जयदेवस्य।
हिंदी अर्थ:
तब लुटेरों के ऐसे व्यवहार को सहन करने में असमर्थ धरती स्वयं ही फट गई। लुटेरे वहीं गिरकर मर गए। सेवकों ने दुखी होकर वहाँ से लौटकर जयदेव और महाराज को यह घटना बताई। सब कुछ सुनकर जयदेव ने कहा— "अरे! मैंने सोचा था कि ये निर्धन हैं और धन के लोभ में पाप करते हैं। यदि इन्हें धन मिल जाए तो आगे पाप नहीं करेंगे। किंतु मेरे दुर्भाग्य के कारण इन्हें अपने प्राण त्यागने पड़े। हे भगवान! इन्हें सद्गति प्रदान करें।"
उसी क्षण जयदेव के कटे हुए हाथ-पैर फिर से पहले जैसे हो गए। अरे, जयदेव की उदारता!
उसी क्षण जयदेव के कटे हुए हाथ-पैर फिर से पहले जैसे हो गए। अरे, जयदेव की उदारता!
अभ्यासः (प्रश्न-उत्तर)
1. जयदेवः कः आसीत्?
उत्तरम्: जयदेवः गीतगोविन्दस्य रचयिता सुप्रसिद्धः महाकविः आसीत्।
(हिंदी अर्थ: जयदेव 'गीतगोविन्द' के रचयिता सुप्रसिद्ध महाकवि थे।)
2. अनया कथया का शिक्षा प्राप्यते?
उत्तरम्: अनया कथया इयं शिक्षा प्राप्यते यत् महापुरुषाः शत्रुप्रतिकारमपि उपकारेण कुर्वन्ति, तेषां हृदि क्षमाशीलता औदार्यं च सदा तिष्ठति।
(हिंदी अर्थ: इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि महापुरुष शत्रुओं से भी उपकार (भलाई) का बदला लेते हैं, उनके हृदय में हमेशा क्षमाशीलता और उदारता रहती है।)
3. मार्गे सेवकाः पृष्टाः लुण्ठकाः किम् उक्तवन्तः?
उत्तरम्: मार्गे सेवकाः पृष्टाः लुण्ठकाः मिथ्या उक्तवन्तः यत् जयदेवः पूर्वम् अस्माकं सह राजकर्मचारी आसीत्, तेन कृतापराधात् वयं तस्य प्राणानां रक्षणं कृत्वा पाणिपादं केवलं कर्तितवन्तः आसन्।
(हिंदी अर्थ: रास्ते में सेवकों द्वारा पूछे जाने पर लुटेरों ने झूठ कहा कि जयदेव पहले हमारे साथ राजकर्मचारी था, उसके द्वारा अपराध किए जाने पर हमने उसके प्राणों की रक्षा करते हुए केवल हाथ-पैर काटे थे।)
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